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VOL. 4, ISSUE 5 (2017)
राष्ट्रीय काव्यधारा: एक अध्ययन
Authors
अंशुला मिश्रा
Abstract
राष्ट्र राष्ट्रीयता अपने राष्ट्र के प्रति वह प्रेमभाव है, जो राष्ट्र के उद्भव तथा विकास की रेखाओं में बँधकर चलता है। जब तक राष्ट्रीयता मात्र प्रेम-भाव प्रदर्शन तक सीमित होती है, इसका रूप सांस्कृतिक होता है, किन्तु जब उसका उद्देश्य राष्ट्र का निर्माण, विकास होता है, तब उसका रूप राजनीतिक होता है। इसीलिए राष्ट्रीयता कभी सांस्कृतिक तथा कभी राजनीतिक रूप में परिलक्षित होती है। 19वीं शताब्दी की राष्ट्रीय चेतना में राजनीति तत्व को समाविष्ट करने का श्रेय मेजिनी को है, जिसने यह स्थापित किया कि राजनीतिक तथा राष्ट्रीय सीमाएँ एक हों। बाद में नैपोलियन तृतीय ने इस स्थापना को कार्यान्वित करने का प्रयास किया। इस काल के बाद से प्रत्येक राष्ट्रीय आन्दोलन का उद्देश्य राष्ट्रीय राज्य का निर्माण, रक्षा और उसकी शक्ति का विकास हुआ। विल्सन के आत्म-निर्णय के कार्यक्रम ने इसको बल दिया और यूरोप में अनेक राष्ट्रों में सार्वजनिक प्रभु-सत्ता की स्थापना की गई, जिसका विकास कालक्रमेण राष्ट्रीय जनतंत्र के रूप में हुआ। जो राष्ट्र गुलाम होता है, वहाँ सांस्कृतिक राष्ट्रीयता पर राजनीतिक राष्ट्रीयता प्रमुख हो जाती है। उस राष्ट्र के निवासियों का चरम उद्देश्य स्वतन्त्रता प्राप्त करना होता है। परतंत्र देश में शोषण आदि की समस्याएँ भी होती हैं और उनके निवारण के लिए बलिदान भी करना होता है। मेजिनी ने ठीक ही कहा है कि सदियों से परतन्त्र राष्ट्र अपने आदर्श तथा आत्म-बलिदान के द्वारा स्वतन्त्रता प्राप्त कर सकता है। स्वतंत्रता प्राप्ति की आकांक्षा विदेशियों के प्रति घृणा एवं द्वेष के आधार पर फूलती-फलती है। इस प्रकार राष्ट्रीयता की भावना का सम्बन्ध राजनीति से हो जाता है शासक नीति की राजनीतिक गतिविधि का शासित जाति की राष्ट्रीयता से घनिष्ठ सम्बन्ध स्थापित है, क्योंकि उक्त गतिविधि के आधार पर ही राष्ट्रीयता की भावना तीव्र अथवा मन्द होती है।
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Pages:394-397
How to cite this article:
अंशुला मिश्रा "राष्ट्रीय काव्यधारा: एक अध्ययन". International Journal of Multidisciplinary Research and Development, Vol 4, Issue 5, 2017, Pages 394-397
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