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VOL. 4, ISSUE 5 (2017)
भारत में संविधानवाद के प्रवर्तन में उच्चतम न्यायालय की भूमिका
Authors
डॉ0 धर्मेन्द्र कुमार सिंह
Abstract
भारतीय लोकतान्त्रिक व्यवस्था में ब्रिटिश संसदात्मक शासन प्रणाली जो कि लोगों की इच्छा को अभिव्यक्त करती है को अपनाया गया है तथा भारतीय संविधान निर्माताओं के द्वारा प्रतिनिधिक लोकतन्त्र की प्रणाली को भारतीय संविधान में समाहित किया गया है । वर्तमान समय में मनुष्य ऐसी राजनीतिक संस्थाओं की खोज में व्यस्त है, जिनकी स्थापना से शासको की शक्ति नियन्त्रित रहे और वे उसका सद्उपयोग कर सकें। वर्तमान राजनीतिक व्यवस्थाओं में नियन्त्रण की यह संस्थागत व्यवस्था व राजनीतिक शक्ति के प्रयोगकर्ताओं की भूमिका को भारतीय संविधान में स्पष्ट रूप से लिखकर निर्धारित किया गया है। संविधान अपने आप में कोई ऐसी युक्ति उपलब्ध नहीं करता है कि वह सभी चीजों को सन्तुलित कर दे, बल्कि यह तो इसका क्रियान्वयन है जो इसके वास्तविक अर्थो को प्राप्त कराता है तथा इसे ही संविधानवाद कहा जाता है। भारतीय संविधान संविधान में विषय को लिखित करने का मुख्य उद्देश्य चीजों को स्पष्टता प्रदान करना तथा उन्हें अक्षुण्ण बनाये रखना था। संविधानवाद कोई व्यवस्था नहीं है अपितु यह तो एक सिद्धान्त है जो कि व्यवहार से आता है। लोकतन्त्रात्मक व्यवस्था तो वस्तुतः नियन्त्रित शक्ति के द्वारा ही सही रूप में कार्य कर सकती है तथा इस दिशा में न्यायापालिका के द्वारा सराहनीय कार्य किया गया है। लोकतान्त्रिक व्यवस्था के सही संचालन के लिए न्यायापालिका की एक महत्वपूर्ण भूमिका होती है, जिसका निर्वहन भारतीय उच्चतम न्यायालय के द्वारा सफल रूप से किया गया है। इस प्रकार भारतीय न्यायपालिका के द्वारा न्यायिक पुर्नविलोकन की शक्ति का प्रयोग करके संविधानवाद के प्रवर्तन में महत्वपूर्ण भूमिका को अदा किया गया है।
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Pages:355-359
How to cite this article:
डॉ0 धर्मेन्द्र कुमार सिंह "भारत में संविधानवाद के प्रवर्तन में उच्चतम न्यायालय की भूमिका". International Journal of Multidisciplinary Research and Development, Vol 4, Issue 5, 2017, Pages 355-359
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