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VOL. 4, ISSUE 5 (2017)
साहित्येतिहासकारों की दृष्टि और 'उत्तरमध्यकाल'
Authors
भारती
Abstract
साहित्येतिहास, साहित्यकीपरम्परा और उसके विकासशील स्वरूप को दिखता है। साहित्येतिहासकारों ने उत्तर मध्यकाल को अपनी -अपनी दृष्टि से परखने की कोशिश की है। शुक्ल जी की दृष्टि विधेयवादी है, हजारी प्रसाद द्विवेदी परम्परा को महत्व देते है तो विश्वनाथ प्रसाद मिश्र उत्तरमध्यकाल को युगीन परिस्थितियों में रखकर देखते है। परंतु एक बात जो इन तीनों ही साहित्येतिहासकारों की दृष्टि का उपेक्षा पात्र बनी, वह है 'स्त्री लेखन'। क्या उत्तरमध्यकाल में कोई भी स्त्री लेखिका नहीं थी? इनके साहित्येतिहास लेखन में एक भी रीतिकालीन स्त्री लेखिका का नाम तक नहीं है। हाँ इस सन्दर्भ में डॉ बच्चन सिंह ने अपने साहित्येतिहास में रीतिकालीन संत काव्य परम्परा में 'दयाबाई' और 'सहजोबाई' को शामिल किया है। डॉ सावित्री सिन्हा ने अपनी पुस्तक 'मध्यकालीन हिंदी कवयित्रियाँ'में 'उत्तरमध्यकाल' की स्त्री लेखिकाओं के काव्य पर गंभीरता से विचार किया है। प्रवीणराय, रूपवती बेगम, शेख रंगरेज एवं सुन्दरकली इत्यादि अनेक स्त्री लेखकाओं को शामिल किया है। वस्तुतः साहित्येतिहासकारों की उत्तरमध्यकाल संबंधी दृष्टि उसके रीति पक्ष पर ही अधिक केंद्रित है। साहित्येतिहास लेखन में केवल साहित्य की प्रधान प्रवृत्तियों एवं कवियों पर ही बल नहीं दिया जाता, बल्कि गौण कवियों एवं प्रवृत्तियों को दिखाना भी साहित्येतिहासकार का लक्ष्य होता है। हिंदी साहित्य के उत्तर मध्यकाल की आलोचना उसके रीति पक्ष को लेकर अधिक की गई है जबकि उस काल के साहित्य में अन्य प्रवृत्तियाँ भी मौजूद है। अतः आज जब हमारे पास साहित्येतिहास को देखने की अनेक दृष्टियाँ और सामग्री मौजूद है तो इस काल के साहित्य पर पुनर्विचार किया जाना चाहिए।
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Pages:299-304
How to cite this article:
भारती "साहित्येतिहासकारों की दृष्टि और <em>'</em>उत्तरमध्यकाल<em>'</em>". International Journal of Multidisciplinary Research and Development, Vol 4, Issue 5, 2017, Pages 299-304
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