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VOL. 2, ISSUE 3 (2015)
मनववाद और अस्मिता-विमर्श का साहित्य
Authors
राजेश कुमार
Abstract
विश्व भर की मानव-सभ्यता और संस्कृति की समस्त उपलब्धियों का केन्द्र मनुष्य मात्र रहा है। लेकिन भारत के सन्दर्भ में स्थ्तिि अपवाद रही है। यहाँ न्यूनतम मानवाधिकार पाने के लिए भी 'मनुष्य मात्र' होना पर्याप्त नहीं। भारतीय समाज में स्त्री, दलित और आदिवासी इसी 'अपर्याप्तता' के शिकार रहे हैं। यही कारण है कि उन्हें यहाँ के साहित्य में भी उचित स्थान नहीं मिल सका। दलित, स्त्री और आदिवासी साहित्य विमर्श सही अर्थों में मानववाद को हिन्दी साहित्य में स्थापित करने के लिए संघर्षरत हैं।
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Pages:925-927
How to cite this article:
राजेश कुमार "मनववाद और अस्मिता-विमर्श का साहित्य". International Journal of Multidisciplinary Research and Development, Vol 2, Issue 3, 2015, Pages 925-927
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